खरतरगच्छ परंपरा

दादा गुरुदेव श्री जिनकुशलसूरिजी

जैन परंपरा में दादा गुरुदेव के रूप में पूजनीय आचार्यों में दादा श्री जिनकुशलसूरिजी का विशेष स्थान है।

“दादा गुरुदेव श्री जिनकुशलसूरिजी जैन धर्म की खरतरगच्छ परंपरा के पूजनीय आचार्य एवं दादा गुरुदेव के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किए जाते हैं। उनकी साधना, आध्यात्मिक प्रेरणा और गुरु परंपरा से जुड़ी दादावाड़ियाँ देश के विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं के लिए आराधना के केंद्र हैं।”

दादा गुरुदेव कौन हैं?

खरतरगच्छ परंपरा में चार प्रमुख दादा गुरुदेवों (श्री जिनदत्तसूरिजी, श्री मणिधारी जिनचन्द्रसूरिजी, श्री जिनकुशलसूरिजी एवं श्री जिनचन्द्रसूरिजी) की महती महिमा है। ये आचार्य अपनी अलौकिक साधना, जन-कल्याण और धर्म प्रभावना के लिए पूजे जाते हैं।

खरतरगच्छ परंपरा में स्थान

दादा श्री जिनकुशलसूरिजी को चार प्रमुख दादा गुरुदेवों में शामिल किया गया है। गुरुदेव की साधना और चमत्कारी कृपा से लाखों भक्त आज भी संकष्ट-निवारण एवं आत्म-शांति हेतु दादा गुरुदेव की भक्ति करते हैं।

दादावाड़ी परंपरा

भारतवर्ष में दादा गुरुदेवों के स्मृति-स्थल व साधना-स्थल को 'दादावाड़ी' कहा जाता है। यहाँ गुरुदेव की चरण-पादुका अथवा प्रतिमा स्थापित होती है जहाँ नित्य पूजा, आरती व बड़ी संख्या में गुरुभक्तों का आगमन रहता है।

उन्हेल दादावाड़ी में विराजमान प्रतिमा

उन्हेल (नागेश्वर) स्थित इस पावन दादावाड़ी में दादा श्री जिनकुशलसूरिजी की अति मनमोहक खड़ी प्रतिमा विराजमान है, जिसकी स्थापना वर्ष 1982 में पूज्य साध्वीजी श्री चंद्रप्रभा श्रीजी म.सा. की पावन प्रेरणा से हुई थी।

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